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 ये कैसा प्यार है  मई जून की गर्मी और दोपहर का समय था गर्म हवाओ के थपेडे पड रहे थे मानो कोई तमाचे मार रहा हो, जिसके कारण सडक पर  सन्नाटा पसरा हुआ था तभी कानपुर से आती हुई बस 'मेरा शहर' के बसस्टाप पर आकर रुकी।  शौर्य अपनी मोबाइल की शाप में बैठा हुआ एक फिल्मी गाना सुन रहा था "  इतनी हसरत है हमें,तुमसे दिल लगाने की । जिंदगी में लाने की तुम्हें अपना बनाने की ।" तभी एसी बस से वह उतरी थी इकदम गोरी चिट्ठी बडी आंखें और लुटरे हुए काले बाल जो उसकी गाल को छू रहे थे और वो अपने हाथों से उसे बार बार अपने चहरे से हटा रही थी । और शौर्य था की बस फटी आंखों से उसे देखे ही जा रहा था वह बोल उठा क्या गजब की लडकी है काश! ऐसा मुझे भी कोई मिल जाए और वह यह तक भूल गया  की उसका एक बहुत ही अजीज दोस्त उसकी शाप में आकर चेयर में बैठ चुका है। उसका दोस्त नवीन उसे आवाज दे रहा था पर ऐसा लग रहा था की उसका शरीर तो वहाँ है पर प्राण नहीं। नवीन ने हाथों से पानी की जब छीटे मारी तब जाकर शौर्य महोदय का ध्यान भंग हुआ और ध्यान टूटते ही बोला देख यार क्या गजब की छोरी है? क्या लगती है यार ? ...