आखिर अमर को लव हो ही गया अमर पेशे से एक अध्यापक था काफी सुलझा हुआ और हमेशा चहरे पर एक मुस्कान । अभी कुछ ज्यादा उम्र न थी उसकी पर काफी कुछ पा लिया था खुशमिजाज हर दिल अजीज था जहाँ भी रहता अपनी एक अलग ही छाप छोड़ जाता अंजाने लोगों के बीच भी तो फिर अपनों कि क्या बात? पर अब वह कुछ दिनो से किसी उलझन मे रहने लगा था। और ऐसा फील कर रहा था कि मानो उसके सर पर कोई भार रख दिया गया हो। जो हमेशा दूसरों को ज्ञान बांटता था आज वही ज्ञान उसके काम नहीं आ रहा था शायद इसी को कहते हैं" जब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है तभी उसे उसकी ऊंचाई का पता चलता है।" जो उसे आज तक नहीं हुआ था वही हो गया पहली बार हो गया था और जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। अमर खुद को कंट्रोल करने की न जाने कितनी नाकाम कोशिशे कर चुका था पर ये भूत ,बला ,बीमारी क्या कहें उसके ऊपर हावी हुए जा रही थी।उसका एक एक दिन बिताना किसी पहाड़ चढने से कम न था। पर करे तो क्या करे ?उसका जीवन तो एक खुली किताब थी पर अब जो उसे यह हो रहा था वह स्वयं इससे अनभिज्ञ था कि आखिर उसके साथ हो क्या र...