आखिर अमर को लव हो ही गया

अमर पेशे से एक अध्यापक था काफी सुलझा हुआ और हमेशा चहरे पर एक मुस्कान । अभी कुछ ज्यादा उम्र न थी उसकी पर काफी कुछ पा लिया था खुशमिजाज हर दिल अजीज था जहाँ भी रहता अपनी एक अलग ही छाप छोड़ जाता अंजाने लोगों के बीच भी तो फिर अपनों कि क्या बात?
पर अब वह कुछ दिनो से किसी उलझन मे रहने लगा था।
और ऐसा फील कर रहा था कि मानो उसके सर पर कोई भार रख दिया गया हो।
जो हमेशा दूसरों को ज्ञान बांटता था आज वही ज्ञान उसके काम नहीं आ रहा था शायद इसी को कहते हैं" जब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है तभी उसे उसकी ऊंचाई का पता चलता है।"
जो उसे आज तक नहीं हुआ था वही हो गया पहली बार हो गया था और जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
अमर खुद को कंट्रोल करने की न जाने कितनी नाकाम कोशिशे कर चुका था पर ये भूत ,बला ,बीमारी क्या कहें उसके ऊपर हावी हुए जा रही थी।उसका एक एक दिन बिताना किसी पहाड़ चढने से कम न था।
पर करे तो क्या करे ?उसका जीवन तो एक खुली किताब थी पर अब जो उसे यह हो रहा था वह स्वयं इससे अनभिज्ञ था कि आखिर उसके साथ हो क्या रहा है और उसका तो मानना था कि उसे यह कभी होगा ही नहीं ।
वह स्वीकार ही नहीं कर रहा था कि वह इस लाइलाज बीमारी की गिरफ्त मे जकडा जा चुका है।
हुआ ये था कि अमर को इश्क हो गया था हां वही इश्क जिसमें अच्छे अच्छे लोग बर्बाद भी हुए और आबाद भी और इश्क हो जाना समस्या न थी बल्कि उसकी समस्या थी उसका प्रोफेशन ।
जिस प्रोफेशन से वह जुड़ा था ,समाज वहाँ प्रेम इश्क मोहब्बत की इजाजत नहीं देता।
पर वह इस प्रोफेशन से पहले एक इंसान है उसकी अपनी एक लाइफ है पर समाज यह सब नहीं समझता।
मुश्किल यह भी न थी कि उसे प्रेम हो गया बल्कि परेशानी यह थी कि उसे अपनी एक्स स्टूडेंट से ही प्रेम हो गया था और शायद यही वजह रही कि उसका दिल मानने को तैयार न था कि उसे प्यार हो गया है।
अमर जो दूसरो को हमेशा सही राह चलने की सलाह देता था जो स्वयं चलता भी था पर आज वह समय के चक्र मे फसकर वह इश्क की राह चल पडा था।
नहीं समझ पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिए और आखिर काफी जद्दोजहद के बाद उसनेँ अपनी अन्तर आत्मा की आवाज सुनी और एक फैसला किया कि वह सबकुछ अपनी एक्स स्टूडेंट दीपिका से बता देगा ।
हिम्मत तो न थी पर फिर भी अपनी इज्ज़त की परवाह किए बगैर कि क्या होगा वह बुरा बन जायेगा या चरित्र हीन कहलाएगा ऐसा करके ,उसने निर्णय लिया कि वह अपनी एक्स स्टूडेंट को फोन कर सब बता देगा , शायद उसकी उलझन कम हो जाए।
अमर ः हैलो
दीपिका ः हैलो गुड ईवनिंग
अमरः कैसे हो और खाना पीना हो गया।
दीपिका ःहमम
अमरः अच्छा सुनो मुझे तुमसे कुछ कहना है वैसे तो तुम्हें सब पता है मेरा ऐसा कोई सीक्रेट नहीं जो तुमसे छिपा हो।
दीपिका ः हममम।
अमरः हां इसलिए ,एक बात और है जो मुझे काफी दिनों से परेशान कर रही है एक बर्डन के समान फील कर रहा हूँ या यूं कहूँ कि मैं बता कर अपना बर्डन कम करना चाहता हूँ।
मैंने जो भी किया जब भी किया निःस्वार्थ भाव से किया कभी कोई एक्सपेक्टेशन नहीं की ,पर शायद आज स्वार्थी बन रहा हूँ।
अमरः हैलो ,सुन रहे हो।
दीपिका ः हममम, सुन रहे हैं बोलिए।
अमरः मुझे पता है कि आज के बाद शायद मैं बुरा हो जाऊं, बहुत बुरा कि शायद तुम मुझसे बात करना भी पसंद न करो।
कि कल तो बडा ज्ञान बाट रहे थे आज क्या हुआ?
ज्ञान नहीं था बस समझाने की कोशिश कर रहा था कि स्वार्थीयो से बचकर रहना, हर कोई मेरे जैसा नहीं होगा।
जो सबकुछ समर्पण कर बैठा हो।
और अगर बुरा हूँ तो बुरे को बुरा समझने में क्या दिक्कत,
पर कोई बात नहीं ,पर मैं इस बर्डन से मुक्त तो हो ही जाऊंगा।
पता है मुझे मैं बहुत ज्यादा टैलेंटेड, स्मार्ट इंटेलीजेंट्स नहीं हूँ पर जो भी हूँ बहुत हूँ खुश हूँ और
मै तुम्हें खुश और ऊचाई की उस बुलंदी पर देखना चाहता हूँ जहाँ हर एक की पहुचने की ख्वाहिश होती है, मेरा तुम्हें या तुम्हारी स्टडी को डिस्टर्ब करने का कोई मोटिव नहीं है । बस मैं जी नहीं पा रहा था खुलकर , कुछ कमी महसूस कर रहा था कुछ बर्डन सा फील कर रहा था।
कल की ही बात है एक फिल्म देख रहा था पर तुम्हारी कमी खल रही थी फिल्म अच्छी थी पर तुम्हारे बिन मन न हुआ देखने का। मै तुम्हें मिस कर रहा था।
कब कैसे किस तरह मुझे कुछ भी नहीं पता कि तुम्हारे करीब होता गया, कभी लगता भी तो खुद को इन सब चीजों से दूर कर लेता पर न जाने ईश्वर क्या चाहता था
हां तुम शुरू शुरू मे क्यूट लगती थी पर न जाने कैसे ये क्यूटनेस लाइकनेस मे बदल गई और लाइकनेस कब लव मे बदल गई पता ही नहीं चला।
कब मैं तुम्हारे करीब होता गया कब तुम्हें महसूस करने लगा कुछ भी पता नहीं चला।
अमरः हैलो क्या हुआ सुन रही हो?
दीपिका ः मुस्कुराते हुए, हममम ,सुन रहे हैं बोलिए।
अमरः तुम्हें शायद ये बकवास लगे पर सच है ।
तुम्हारा मेरे आस पास होना महसूस हो जाता है,
तुम्हें होने वाली हर तकलीफ का अनुभव हो जाता है तुमसे जुडी हर घटना का आभास किसी न किसी माध्यम से पहले ही हो जाता है। तुम्हारा रिजल्ट आना या तुम्हारा दूर जाना रहा हो सब कुछ आभास हो गया था।
पर मैं समझता रहा ये सब यूं ही ऐसे ही है इसलिए इग्नोर कर देता पर जब सच मे ऐसा हो जाता तब मैं उलझन में पड जाता कि ऐसा क्यों हो रहा है ?इसके लिए न जाने कितने साइकोलॉजी की बुक्स पढी कितने वीडियो देख डाले। तब जाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मुझे जो कभी न हुआ था जिसकी और जिससे कभी कल्पना भी न की थी वही लाइलाज बीमारी हो गई है, तुमसे प्यार हो गया है।
पता है यह जानकर शायद तुम्हारी नफरत और बढ जायेगी। तुम्हारी हां होगी तो अच्छा होगा और न होगी तो भी अच्छा ही होगा।
कभी कभी सोचता था कि न जाने तुम क्या सोचती होगी मेरे बारे मे।
दीपिका ः हमे कभी भी किसी के विषय मे ऐसा कुछ फील ही नहीं हुआ।
अमरः गुड अच्छी बात है।
पर मुझे हो गया इसलिये बता दिया।
बस यही बताना था ।
बाय , टेककेयर।।।

लेखक -, अमित

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