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               आखिर अमर को लव हो ही गया अमर पेशे से एक अध्यापक था काफी सुलझा हुआ और हमेशा चहरे पर एक मुस्कान । अभी कुछ ज्यादा उम्र न थी उसकी पर काफी कुछ पा लिया था खुशमिजाज हर दिल अजीज था जहाँ भी रहता अपनी एक अलग ही छाप छोड़ जाता अंजाने लोगों के बीच भी तो फिर अपनों कि क्या बात? पर अब वह कुछ दिनो से किसी उलझन मे रहने लगा था। और ऐसा फील कर रहा था कि मानो उसके सर पर कोई भार रख दिया गया हो। जो हमेशा दूसरों को ज्ञान बांटता था आज वही ज्ञान उसके काम नहीं आ रहा था शायद इसी को कहते हैं" जब ऊंट पहाड़ के नीचे आता है तभी उसे उसकी ऊंचाई का पता चलता है।" जो उसे आज तक नहीं हुआ था वही हो गया पहली बार हो गया था और जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। अमर खुद को कंट्रोल करने की न जाने कितनी नाकाम कोशिशे कर चुका था पर ये भूत ,बला ,बीमारी क्या कहें उसके ऊपर हावी हुए जा रही थी।उसका एक एक दिन बिताना किसी पहाड़ चढने से कम न था। पर करे तो क्या करे ?उसका जीवन तो एक खुली किताब थी पर अब जो उसे यह हो रहा था वह स्वयं इससे अनभिज्ञ था कि आखिर उसके साथ हो क्या र...
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                                                डायरी महात्मा गांधी को पढ रहा था और पढते हुए ऐसा लगा कि मुझे भी अपनी आटो बायोग्राफी लिखनी चाहिए पर खयाल आया कि लिखुंगा क्या ? ऐसा तो कुछ है  नहीं, हुआ ही नहीं कुछ जीवन मे, जिसे लिखा जाए, फिर लिखूं क्या ? ये एक बडा प्रश्न उठ खडा हुआ मेरे सामने, लिखने के विषय में। और अचानक से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की बात याद आई। उन्होंने कहा था कि हमें प्रतिदिन डायरी लिखनी चाहिए । कुछ न हो लिखने के लिए तो अपने प्रतिदिन के कार्यों को ही लिखें पर लिखें जरूर। मुझे भी लगा कि सही तो है लिखने मे बुराई क्या है ? यदि मैं किसी क्षेत्र में प्रसिद्ध नहीं । क्या एक आम आदमी को हक नहीं अपने जीवन के विषय में लिखने का। वह आम आदमी ही तो होता है जो एक विशेष आदमी बनता है और क्या पता समय कब करवट ले बैठे। "समय की ही तो बात होती है कि अमीर घर का चोर लडका इमानदार तो वहीं गरीब घर का इमानदार लडका भी चोर नजर आता है।" गांवों मे एक उक...
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                    सूटकेस वाली पूरा स्टेशन लोगों से खचाखच भरा हुआ था हर तरफ भारी भीड़  और धक्का-मुक्की का आलम था ।सभी को अपने अपने गंतव्य तक जाने की जल्दी थी तो इसलिए सभी बड़ी बेसब्री से अपनी अपनी ट्रेनों के आने का इंतजार कर रहे थे राहुल भी किसी तरह धक्के मुक्के  खाते प्लेटफॉर्म पर जा पहुंचा पहले तो भीड़ को देख कर मन किया कि वापस हो  जाए पर देर हो चुकी थी वापस जाने का कोई साधन नहीं और साथ में इतना सामान बड़ी आफत थी । अभी किसी तरह उसने खुद को अडजस्ट ही किया था कि अचानक उसकी नजर एक गोरी चिट्टी सुंदर सी युवती पर पड़ी जो एक नीले रंग का सूट सलवार पहने हुए खड़ी थी और बड़ी ही व्याकुलता से ट्रेन के आने का इंतजार कर रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे वह घर छोड़ कर आई थी या उसका कोई पीछा कर रहा था क्योंकि रह-रहकर बार-बार, वो लिए हुए अपने सूटकेस को देखती और तो कभी डरी डरी इधर उधर देखती तो कभी कभी बाहर गेट की ओर देखती । कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा है जो उसे पकड़ ले जैसे कोई चोर हो या चोरी करके आई हो इस तरह से सहमी सहमी सी थी और प्ल...
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              गर्लफ्रैंड एक खोज कार्तिक निहायती सीधा साधा एक शरीफ लडका था और वह उम्र के ऐसे पडाव पर आ पहुंचा था कि उसके हृदय में किसी को गर्लफ्रेंड बनाने की तीव्र इच्छा होने लगी थी हृदय मे हलचल होने लगी थी कुछ ऐसे ही जैसे बरसात वाले बादल जो आसमान में उमडते घुमडते हैं पर बरसते नहीं। बस आकर लोगों को डराते हैं तो कभी कभी उत्साहित करते हैं कुछ ऐसे ही कार्तिक के दिल हाल भी था जो गर्लफ्रैंड बनाने के लिये उतावला था। कार्तिक यही कोई तेइस चौबीस वर्ष का रहा होगा पर उसके घर में अब उस पर शादी कर लेने का दबाव बनाया जाने लगा था पर उसके हृदय में तो गर्लफ्रेंड बनाने की इच्छा जन्म ले चुकी थी ।तो ऐसे मे वह शादी कैसे कर सकता था ।वह शादी करने के सवाल पर न नुकुर करता और बहाने बना देता । हद तो तब हो गई जब लोग उसे देखने आने लगे और कई लोग तो उसे देख भी चुके थे। पर कार्तिक था कि उसने अपनी मा से कह दिया कि देखो चाहे कुछ भी हो जाए मुझे शादी ब्याह के चक्कर में अभी नहीं पडना । पहले मै अपने पैरों पर खडा हो जाऊ कुछ ढंग का काम करने लग जाऊं तब करुंगा शादी । पर सच ...
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                                     टाइम पास मेरा शहर का चौराहा कितना फेमस हो चला था दिन के समय जितना व्यस्त रहता चहलपहल रहती उतना ही रात के सन्नाटे मे खो जाने वाला चौराहा था और इसके इसी गुण के कारण मेरा शहर के बासिंदो ने इस चौराहे का नामकरण कर दिया," गुलजार सन्नाटा चौराहा।" दिन के वक्त गुलजार और रात के समय सन्नाटा इसलिए गुलजार सन्नाटा चौराहा। आज इसी गुलजार सन्नाटा चौराहे पर कुछ दिन की छुट्टीयो पर आया अनिकेत एक चाय की दुकान पर बैठा किसी पुरानी फिल्म के गाने के बीच चाय की चुसकियो का आनन्द ले रहा था, "  चांदी की दीवार न टूटी प्यार भरा दिल तोड दिया इक धनवान कि बेटी ने निर्धन का दामन छोड़ दिया ,चांदी की दीवार न टूटी... . "   तभी उसकी नजर इंजीनियरिंग कालेज की आकर रुकी बस से उतरते कुछ स्टूडेंट्स पर पडी जिसमें एक जोडा उतरकर सीधे चाट बताशे की लगी ठेलिया की ओर बढ आया। अनिकेत का पूरा ध्यान उन्हीं खूबसूरत जोडे पर जाकर केंद्रित हो गया । पूरा दृश्य अपनी नजरों में कैद करने लगा जैस...
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 ये कैसा प्यार है  मई जून की गर्मी और दोपहर का समय था गर्म हवाओ के थपेडे पड रहे थे मानो कोई तमाचे मार रहा हो, जिसके कारण सडक पर  सन्नाटा पसरा हुआ था तभी कानपुर से आती हुई बस 'मेरा शहर' के बसस्टाप पर आकर रुकी।  शौर्य अपनी मोबाइल की शाप में बैठा हुआ एक फिल्मी गाना सुन रहा था "  इतनी हसरत है हमें,तुमसे दिल लगाने की । जिंदगी में लाने की तुम्हें अपना बनाने की ।" तभी एसी बस से वह उतरी थी इकदम गोरी चिट्ठी बडी आंखें और लुटरे हुए काले बाल जो उसकी गाल को छू रहे थे और वो अपने हाथों से उसे बार बार अपने चहरे से हटा रही थी । और शौर्य था की बस फटी आंखों से उसे देखे ही जा रहा था वह बोल उठा क्या गजब की लडकी है काश! ऐसा मुझे भी कोई मिल जाए और वह यह तक भूल गया  की उसका एक बहुत ही अजीज दोस्त उसकी शाप में आकर चेयर में बैठ चुका है। उसका दोस्त नवीन उसे आवाज दे रहा था पर ऐसा लग रहा था की उसका शरीर तो वहाँ है पर प्राण नहीं। नवीन ने हाथों से पानी की जब छीटे मारी तब जाकर शौर्य महोदय का ध्यान भंग हुआ और ध्यान टूटते ही बोला देख यार क्या गजब की छोरी है? क्या लगती है यार ? ...
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