डायरी


महात्मा गांधी को पढ रहा था और पढते हुए ऐसा लगा कि मुझे भी अपनी आटो बायोग्राफी लिखनी चाहिए पर खयाल आया कि लिखुंगा क्या ? ऐसा तो कुछ है  नहीं, हुआ ही नहीं कुछ जीवन मे, जिसे लिखा जाए, फिर लिखूं क्या ?
ये एक बडा प्रश्न उठ खडा हुआ मेरे सामने, लिखने के विषय में।
और अचानक से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की बात याद आई। उन्होंने कहा था कि हमें प्रतिदिन डायरी लिखनी चाहिए । कुछ न हो लिखने के लिए तो अपने प्रतिदिन के कार्यों को ही लिखें पर लिखें जरूर।
मुझे भी लगा कि सही तो है लिखने मे बुराई क्या है ?
यदि मैं किसी क्षेत्र में प्रसिद्ध नहीं । क्या एक आम आदमी को हक नहीं अपने जीवन के विषय में लिखने का। वह आम आदमी ही तो होता है जो एक विशेष आदमी बनता है और क्या पता समय कब करवट ले बैठे।
"समय की ही तो बात होती है कि अमीर घर का चोर लडका इमानदार तो वहीं गरीब घर का इमानदार लडका भी चोर नजर आता है।"
गांवों मे एक उक्ति भी कही जाती है कि" एक दिन घूरे का दिन भी आता है।"
बस फिर क्या  एक कोशिश की है लिखने की "डायरी"।
चूँकि महात्मा गांधी से काफी  हद तक प्रभावित हूँ और गीता तो जैसे रग रग मे बसती है तो वहीं एक कोशिश ये भी है कि प्रभु श्री राम सी मर्यादा हो ,
पर आज का युग ऐसा है कि श्री कृष्ण के जैसे चरित्र की भी कामना करता हूँ जो हर क्षेत्र में निपुण थे और उनके यही गुण मुझे आकर्षित करते हैं । ये संयोग ही होगा या फिर अराध्य की इच्छा कि जो प्रभु श्री राम और कृष्ण के अराध्य रहे वही मेरे भी अराध्य हैं जो अब मेरे हृदय मे, मेरे रोम रोम में विराजते हैं जिन्हें मैं महसूस करता हूँ। और इसलिये
कहूं तो मेरे धर्म का मुझपर गहरा प्रभाव है।
पर इसका अर्थ यह बिल्कुल भी नहीं कि मैं किसी धर्म का आदर नहीं करता ,मैं उन जैसा नहीं जो किसी दूसरे धर्म के ईश्वर का नाम लेने मात्र से घबरा जाते हो , धर्म तो वह है कि हमारे द्वारा किसी का हृदय न दुखे।
खैर मेरी तो कोशिश रहती है कि किसी भी धर्म से  जीवन को श्रेष्ठ बनाने का कुछ ज्ञान प्राप्त हो तो बस ग्रहण कर लो और जहाँ से मिलता है मैं ग्रहण करने के साथ जीवन में उतारने की कोशिश भी करता हूँ।
बाकी सब ईश्वर पर छोड़ देता हूँ उसे कौन समझ पाया है और उसकी माया को।
मैं जो भी कहता हूँ पूरी न सही लेकिन अस्सी प्रतिशत मैं अपनी बातों पर खरा उतरने की कोशिश भी करता हूँ।
अस्सी प्रतिशत इसलिये कि इंसान ही हूँ भाई भूल हो सकती हैं गलतियाँ कर सकता हूँ।
वैसे बात करूं तो बचपन से ही मैं कल्पना करने वाला, विचारों में खो जाने वाला रहा हूँ और एकांत मे रहना मुझे अच्छा लगता था पर अब काफी बदलाव आया है या यूं कहूं कि अब साथ अच्छा लगता है और जहाँ तक मुझे लगता है उस समय मेरी उम्र के हर एक लडके को सूपर हीरो अच्छे लगते होंगे और उनके जैसे बनने की कोशिश करते होंगे ऐसा ही कुछ मैं भी था ।
मुझे शक्तिमान ,जूनियर जी , बेताल पच्चीसी धारावाहिक अच्छे लगते थे। मुझे याद है कि इतने अच्छे लगते थे कि लंच के समय शक्तिमान देखने के लिए हम सभी बच्चे स्कूल से भाग जाते थे और जिसके घर मे टीवी चल रही होती वहाँ पहुंच जाते और उसके घर का नजारा तो बिल्कुल सिनेमा हाल जैसा हो जाता था इतनी भीड हो जाती थी कितनी बार तो हम दुत्कार के भगा दिये गए होंगे कुत्तों के जैसे पर मजाल हम वहाँ से टस से मस हों।
 हम सब बेशर्म बनकर बैठे रहते ।
शक्तिमान अच्छा लगता था तो शक्तिमान बनने की कोशिश करता शक्तिमान बनने की कल्पनाएं करता ।
तो वहीं 'जय श्री कृष्णा' रामायण, महाभारत ओम नमः शिवाय जय बजरंगबली आदि धारावाहिकों की एक लंबी फेहरिस्त है जो मुझे अच्छे लगते थे प्रभावित करते थे और इनमें दिखाए जाने वाले राक्षसों, ऋषियों आदि को तपस्या करके ईश्वर से मिलने वाला वरदान का दृश्य  मुझको खूब लुभाता था ।
मेरे हृदय में भी ईश्वर से वरदान प्राप्त करने की चाह जाग उठती थी मेरी ईश्वर मे श्रध्दा बढ जाती थी वरदान प्राप्त करने के लालच मे।
बस फिर क्या था मैं भी ईश्वर से वरदान पाने की लालसा लेकर उन्हें प्रसन्न करने के लिए कभी ओम नमः शिवाय तो कभी गायत्री मंत्र आदि का जप करता करीब आधे - आधे घंटे दस -पंद्रह दिन  तक करता और जब कुछ न होता तो हताश हो जाता और कहीं न कहीं यही कारण रहा कि मेरा अंडा आमलेट आदि खाना सब छूट गया और ऐसा छूटा की अब तो उसकी महक से भी वोमिट आने सी लगती है , जी मिचलाने लगता है। मुझे लगता था कि अगर अंडा या अंडे से बनी चीजें खाऊँगा तो ईश्वर मुझसे नाराज होंगे मुझे शक्तियां नहीं देंगें इस लिए सब छूट गया। मांस मछ्छि तो वैसे भी नहीं खाता था।
मैं अपनी बडाई नहीं करता पर सच है ।
 एक बात और खास रही कि मैंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा पर मजेदार बात ये रही कि मुझे हमेशा ये खयाल आता रहा कि जो मेरी हेरोइन (गर्लफ्रैंड) हो वह मुसीबत मे पड जाये और मैं उसे हीरो बनकर बचाने जाऊं ।
  जब भी ऐसी कल्पना की कि मुझे वरदान प्राप्त हो जायेगा तब  तब एक  हेरोइन की छवि जेहन में जरूर उभर कर आइ। ये खयाल आता की वह मुसीबत में है और मैं उसे बचाने जा रहा हूँ ,कभी कभी ऐसे भी खयाल आये की शक्तियां मिलने के बाद करुंगा क्या? शक्तियां तो नहीं मिली पर कुछ भी हो मजा बहुत आता था कल्पना करने में। जब भी कहीं की यात्रा बस , ट्रेन  आदि से करता तो आखें बंद करता और इसी तरह की कल्पनाएं करता । मेरे साथ पता नहीं क्या रहा कि वक्त के साथ साथ जीवन के हर मोड पर मेरा कोई न कोई धारावाहिक फेवरिट रहा और कोई न कोई पसंद भी आता रहा है तो उसे भी अपनी कल्पनाओं मे  शामिल कर लेता ऐज माई हेरोइन( गर्लफ्रैंड) वगैरह वगैरह।
आज जब मैं इतना बड़ा हो गया हूँ समझदार ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा समझदार जरूर हो गया हूँ तब भी मेरे बचपन का वो गीत जो मुझे आज भी शक्तीमान बनने की मुझमें इच्छा पैदा कर जाता है समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा दे जाता है मुझे आज भी याद है वो गीत।

"अद्भुत अदम्य साहस की परिभाषा है(हूँ) ये(मैं) मिटती मानवता की आशा है (हूँ)ये(मैं) ऋ्ष्टि की शक्ति का वरदान है(हूँ) ये(मैं) अवतार नहीं है (हूँ)ये (मैं)इंसान है(हूँ)

शक्तीमान शक्तीमान....।


मैं हमेशा इस गीत में 'है 'की जगह' हूँ 'और 'ये 'की जगह 'मैं' करके गुनगुनाता रहा हूँ।
ये सारे धारावाहिक पसंद आने का कारण भी रहा कि मैं हमेशा से थोड़ा रोमांटिक फीलिंग वाला रहा हूँ इनकी पाठ कथा ऐसी होती थी कि एक लगाव हो जाता था यद्यपि मेरा बचपना बहुत शांत रहा है थोड़ा संकोची स्वभाव भी रहा है।
मैंने कभी किसी को प्रपोज नहीं किया हां पसंद कई लडकियां आईं और कौन लडकी मुझे पसंद करती थीं मुझे पता था पर कभी भी इस ओर ध्यान नहीं दिया । ये कभी नहीं रहा कि मुझे हीर रांझा बनना है।
हां एक दो बार ऐसा रहा कि जब मुझे लगा कि मुझे प्यार हो गया है और और मैं परेशान हो उठा था अक्सर करके उस लडकी का खयाल आ जाता था गाने सुन लेता तो लगता ये तो मेरे लिए बनाया गया है । मैं अफेक्शन को ही लव समझ बैठता था मुझे वास्तविकता मे पता ही नहीं था कि प्रेम क्या है? मोह और प्रेम इनमें अंतर क्या है?
पर अब ऐसा नहीं है अब समझ चुका हूँ प्यार ,मोह और लगाव आदि को इनका क्या अर्थ होता है ।
हां अगर अब कोई पूछे तो मैं कह सकता हूँ कि मुझे है प्रेम एक लडकी से जिसे मैं बहुत ही अच्छी तरह से जानता हूँ जिसके साथ मैंने काफी वक्त साथ मे बिताया है ।
मैं कहीं भी रहूँ जिस तरह से अराध्य हरपल मेरे साथ होते हैं उसी तरह वह भी हरपल मुझे मेरे करीब ही महसूस होती है।
मैं कुछ भी लू ,खरीदूं, खाऊ तो उसका खयाल पहले आ जाता है कि उसके लिए भी कुछ ले लूं , लेता चलूं।
ये को-इंसीडेंट नहीं हो सकता कि उसे कुछ भी होता है तो मुझे अहसास हो जाता है । उसे कुछ भी होते ही मेरे साथ भी कुछ न कुछ घटित जरूर हो जाता है और ये मेरे अराध्य की कृपा ही है जो मेरे स्पर्श करते ही जैसे उसका कष्ट मुझे प्रतीत होने लगता है ऐसा लगता है कि जैसे उसका दर्द खुद मे फील करने लगता हूँ  या यूं कहूँ कि उसके ऊपर आने वाली हर विपदा को हम बांट लेते हैं (मीन्स मैं और अराध्य )और वैसे भी मैं खुद को अलग ही मानता आ रहा हूँ सबसे कि कुछ तो स्पेशल है मुझमें।
और मैं यही चाहता भी तो हूँ अराध्य से क्योंकि पता नहीं क्यों मुझे किसी की तकलीफ नहीं देखी जाती और फिर मैं तो उसे प्रेम करता हूँ अब । इतना कि जिसकी इंतहा नहीं।तभी तो
मै कहीं भी होता हूँ तब भी उसकी यादें मेरे साथ होती हैं , सच कहूँ तो पता नहीं क्यूं उसके बिन सब अधूरा लगता है,
लगता है कि उसके बिन मेरे जीवन में कोई रंग ही नहीं। मेरे हर एक  सफर मे उसकी कमी खलती है मेरे कुछ भी खुद स्वयं के लिए करने से पहले उसका खयाल आ जाता है अगर बाहर होता हूँ तो लगता है कि उसके लिए भी कुछ उपहार लेते चलूं पर कभी कभी उसकी बेरुखी का खयाल आते ही दिमाग जैसे मना सा करने लगता है कि किस लिए किसके लिए ले रहा हूँ जो मुझे कुछ समझना ही नहीं चाहता। पर दिल नहीं मानता और कुछ न कुछ ले ही लेता हूँ।
उसके साथ होने वाली हर घटना का आभास मुझे पहले ही हो जाता है ।,उसे होने वाली मानसिक या शारीरक हर एक पीडा ,कष्ट का भगीदार भी बन जाता हूँ अराध्य से कहकर। भले ही उसे अहसास हो या न हो उसे ,मेरी मोहब्बत दिखती हो या न हो। पर मेरे हृदय में उसके लिए असीम प्रेम है।
मुझे पता है उसके हृदय में मैं कुछ खास मायने नहीं रखता पर कोई बात नहीं मैं तो  प्रेम करता हूँ इतना ही काफी है ।
मैं बनिया हूँ तो क्या हुआ पर व्यापारी नहीं जो लाभ हानि देखूं।  पर एक विश्वास है । मेरी मोहब्बत समझेगी एक दिन और इसलिए मैं उसके जीवन में दखल नहीं देना चाहता । मेरा हृदय कृष्ण सा प्रेम चाहता है पर कभी कभी मन मे राधा के जैसे अधिपत्य अधिकार जताने वाला प्रेम उत्पन्न हो जाता है ।
मैं कौन होता हूँ किसी की जिंदगी मे दखल देने वाला वह स्वतंत्र है बस मुझे उसकी परवाह रहती है फिक्र रहती है । हां जब मुझमें मैं कभी कभी स्वार्थ ,मैं उत्पन्न हो जाता है तब सोच बैठता हूँ क्यों परवाह करता हूँ क्यों उसकी तकलीफों को स्वयं पर ले लेता हूँ कभी कभी उसका इग्नोर करना बहुत खलता है बहुत कष्ट देता है और जैसे ही मैं मुझसे दूर होता है सबकुछ नार्मल हो जाता है और फिर मैं अपने आराध्य की कृपा और इच्छा पर सब छोड़ देता हूँ।
मैंने कई बार गौर किया कि जब जब मैं कोई गाना सुनता, फिल्में देखता या अपने फेवरिट धारावाहिक देखता तो उनकी कहानियों में खुद के वजूद को पाता हूँ । जैसे राधाकृष्ण मुझे इतना भाता है कि मै क्या कहूँ और इस मे राधा कृष्ण के जो पात्र हैं और जो कहानी है ऐसा लगता है ये मैं ही तो हूँ ऐसा मेरे साथ भी तो है वैसे मेरी समाज में एक अच्छी छवि है लोग बडा ही स्नेह करते है जहाँ भी जाता हूँ रहता हूँ सबको अपना बना लेता हूँ और मैं भी जैसे पूरी तरह से समर्पित हो जाता हूँ।
आया हूँ अजनबी शहर में, अजनबी बनकर।
पर कुछ तो बात है मुझमें, कहीं भी नहीं रहता अजनबी बनकर
और शायद इसलिए  मुझे ऐसा लगता है कि मैं किसी खास मकसद से जन्मा गया हूँ दो तीन बार मृत्यु की गोद से वापस लौट कर आना मुझे सोचने पर विवश कर देता है कि मैं कौन हूँ, मेरा अस्तित्व क्या है ,क्या उद्देश्य है इस जीवन का ?
मुझे किसी भी बात की परवाह नहीं चिंता नहीं कि मैं क्या हूँ किस औहदे पर हूँ या क्या प्राप्त करना है? किसी भी चीज की परवाह नहीं। बस परवाह है तो सिर्फ उसकी जिसे मैं प्रेम करने लगा हूँ और ऐसे लोगों की परवाह है जो कष्ट मैं है जो किसी न किसी तरह से पीड़ित हैं यद्यपि श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें हर अवस्था में एक जैसा रहना चाहिए सम रहना चाहिए पर फिर भी जब मैं बीमार, अपाहिज , गरीब जिसके पास न तो तन ढकने के लिए कपडे हैं और न खाने के लिए उचित भोजन है मुझे बडा कष्ट होता है मैं व्याकुल हो जाता हूँ सोचता हूँ कि इनके लिए क्या कर सकता हूँ और अगर कुछ नहीं कर सकता तो फिर फिक्र क्यों? अक्सर ऐसा भाव आता है मन में कि काश मेरे हाथों में कुछ ऐसा जादू सा होता कि मेरे स्पर्श करने से लोगों के कष्ट दूर हो जाते उनकी पीडा कष्ट मुझे मिल जाते। हताश हो जाता हूँ लोगों के कष्ट देखकर , जब कुछ नहीं कर पाता । इक लाचारी महसूस करता हूँ और घृणा सी होने लगती हैं इस जीवन से।पर कभी कभी मैं खुद को छला हुआ भी पाता हूँ पता नहीं ऐसा क्यों है कि जब मेरा समरपर्ण होता है तो दिल से समर्पित हो जाता हूँ
जो भी करता हूँ किसी के लिए हृदय से करता हूँ। मेरे हृदय में उसकी एक विशेष जगह सी बन जाती है फिर कभी कभी जब ठगा महसूस करता हूँ , तो ये भाव भी आता है कि मुझे भी स्वार्थी होना चाहिये।मैं भी ऐसे लोगों के काम न आउं कि जब जरूरत पडती है तभी मुझे याद करते हैं तो मैं क्यों इनकी फिक्र करु?
पर जब मन शांत हो जाता है तो मन से एक आवाज़ सी आती है जैसे मेरे आराध्य कहते  हो मुझसे कि वत्स जहाँ अंधकार होता है वहीं दीपक(रोशनी)  की जरूरत पडती है बस तुम अपना कर्म करते रहो, मैं हूँ न तुम्हारे साथ। बस और मेरा सारा क्रोध ,दुख स्वतः शान्त हो जाता है।

ये थी मेरी डायरी के कुछ पन्ने ।

'नकुल' ।


Author Amit Sahu

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