जानते हो।
मैं तुम्हें कुछ बताना चाहता हूँ कुछ कहना चाहता हूँ। मैने कई बार सोचा महसूस किया बताना चाहा ,पर बताया नहीं।
वैसे इसलिए भी नहीं बताया क्योकि मै जानता हूँ कि तुम्हारे हृदय में मै नहीं बसता ,मै नहीं रहता , कोई और है जो तुम्हारे खूबसूरत हृदय में रहता है मै नहीं।
ऐसे में किस अधिकार से बताता तुम्हे ।
मेरा कोई अधिकार नहीं है तुम पर और कैसा किस प्रकार का अधिकार । मै जबरदस्ती क्यू जताऊ अधिकार किसी पर।
अधिकार तो वहाँ होता है जहाँ प्रेम होता है ,जहाँ विश्वास होता है जहाँ व्यक्ति एक दूसरे को समझता है जहाँ एक दूसरे का अहसास होता है।
मै नहीं जानता तुम्हें है या नहीं।
पर मुझे है तुम्हारा अहसास ,
क्यू है शायद सही तरह से मुझे भी नहीं पता और शायद तुम्हें भी ,पर हम इसी अहसास को प्रेम मोहब्बत इश्क प्यार न जाने क्या क्या नाम देते हैं ।
मै इस अहसास को क्या नाम दूं समझ में ही नहीं आता ,
जब भी तुम मेरे आस पास होते हो या मेरे करीब से गुजरते हो ,
किसी भी काम में व्यस्त क्यो न रहूँ तुम्हारे होने का अहसास हो ही जाता है ।
और जब भी नजरे उठाकर देखता हूँ तो तुम्हें अपने नजरों के सामने पाता हूँ।
तुम कुछ भी समझो पर यही सत्य है ,पर उस समय तुमसे न बोलने या देखकर नजर अंदाज करने का कारण बस इसलिए की कोई तुम्हें भला बुरा न कहे मेरी वजह से , रही देखने की बात तो वो तो अहसास होते ही देख लेता हूँ चोर नजरो से पर लगातार घूरना अच्छा नहीं लगता ।
बहुत बुरा लगता है जब कोई किसी को यू एकटक घूरकर देखता रहता है और फिर फबतियां कसना बहुत ही ओछी हरकत ,
शब्द नहीं की ऐसे लोगो को क्या कहूं।
पर हां एक झलक तुम्हारी मिलते ही मेरे रोम रोम मे प्रसन्नता छा जाती है।धडकने रेस के घोडे के जैसे गतिमान हो जाती है और बस लगता है कि विजय पताका लहराने ही वाली है।
तुम्हारी मुस्कराहट न जाने मुझे कैसा सुकून दे जाती है और अगर तुमसे जब कभी बात हो जाती है तो पूछो मत ,मेरे पास शायद शब्द ही नहीं की कैसे उन लम्हों को व्यक्त करु।
बस इतना ही कह सकता हूँ कि जैसे धरती से सीधे स्वर्ग पहुंच जाता हूँ।
वैसे जानता हूँ की तुम्हारा जवाब न ही होगा ,पर फिर भी पूछता हूँ,
क्या तुम्हें ऐसा अहसास हुआ है कभी ।
अमित साहू....✒

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