शादी का निमंत्रण
आज सुबह जब आकार सोकर उठा तो बहुत ही खुश था उसे आज जान्हवी से मिलने जो जाना था पर उसे क्या पता था कि आज उसके जीवन में एक भूचाल आने वाला है उसके सपने बिखरने वाले है वह जिन तस्वीरो में रंग भरने के सपने संजोये हुए है वो आज रंग भरने से पहले ही सादे कागज के सिर्फ पन्ने रह जाने वाले हैं ।
उसका जीवन जैसे तैसे अच्छा बीत रहा था घर में मा पिता जी और एक भाई बहन थे।आकार एक प्राइवेट कम्पनी में अच्छी पोस्ट पर जाब कर रहा था ,बस कमी थी तो सिर्फ एक वाइफ की , बाकी सबकुछ तो था उसके जीवन में।
अरे हां एक गर्लफ्रेंड भी तो थी जिसे वह बेइंतहा प्रेम करता था और जान्हवी भी तो करती थी बेइंतहा मोहब्बत , और दोनों शादी करके हमेशा हमेशा के लिए एक हो जाना चाहते थे।
बस अगर कुछ ठीक नहीं था तो बस इतना कि उसके और जान्हवी के माता पिता को ये रिश्ता मंजूर नहीं था , नहीं पसंद था । क्यूँ नही पसंद था क्या वजह थी पता नहीं,
दोनो ने कितनी कोशिशें की थी अपने माता पिता को मनाने की ,पर वो कहाँ माने थे ।उन्हे अपने बच्चों की खुशियाँ कहाँ दिखाई दी थी। जो माता पिता एक बार कुछ मांग लेने पर तुंरत ख्वाहिशे पूरी कर देते थे आज उन्हें अपने बच्चो की कोई परवाह न थी ।
फिर भी आकार को कहीं न कहीं यह विश्वास था कि वह अपने माता पिता को मना ही लेगा इस रिश्ते के लिए और हुआ भी यही।
पर वहीं दूसरी ओर जान्हवी थी कि उसे अपनी मा पिता से बात करने में डर लगने लगा था और लगे भी क्यूं न । उसने विश्वास जो खो दिया था। उसके माता पिता को कितना भरोसा था अपनी बेटी पर , पर आज वह सारे भरोसे को तोड़ चुकी थी आकार की मोहब्बत में।
जो माता पिता अपनी बेटी की तारीफे करने से थकते नहीं थे उन्हें आज चिढ सी हो गई थी जान्हवी से।
उसके कालेज आने जाने पर भी तो प्रतिबंध लग गया था जबकि कालेज खत्म होने में कुछ ही दिन शेष थे बीए की फाइनल परीक्षाएं प्रारंभ होने वाली थी ,पर जान्हवी की मोहब्बत ने उससे उसका कालेज, उसकी आजादी सबकुछ तो छीन लिया था।अब उसके पास बचा था तो सिर्फ घुट घुट के जीने सिवाय कुछ भी न था।
तो वहीं आकार था जो अपने काम पर जा जरूर रहा था पर मन नहीं लग रहा था उसके मालिक ने कितनी बार अबतक उसकी बेइज्जती कर चुका था काम से निकाल देने की धमकी दे चुका था। वहीं आकार था कि जान्हवी से न बात कर पा रहा था और न ही मिल पा रहा था महीनों से।
आकार सबकुछ ठीक करने की कोशिश में लगा हुआ असहाय महसूस कर रहा था।
कभी कभी यूं ही बैठकर अपने पुराने बीते पलो को याद करता कि कैसे पहली बार जान्हवी से मिला था और अनायास ही चहरे पर एक मंद मुस्कान की लहर दौड जाती।
उसका बीए फाइनल वर्ष था और जान्हवी का प्रथम।
दोनो कालेज पहुचे ही थे कि जोरो की बारिश शुरू हो गई थी और दोनो ही लगभग आधे आधे भीग गए थे जैसे तैसे भीगते बचते बचाते दौडकर कालेज के अंदर प्रवेश किया था और क्लास में जाकर देखा तो बमुश्किल से पांच से सात स्टूडेंट ही थे पूरा का पूरा दृश्य किसी फिल्म की कथानक का सा प्रतीत हो रहा था।कि सिर्फ हीरो ,हीरोइन और बारिश । ऐसे सुहावने मौसम में जो हो जाता है अक्सर वही आज आकार और जान्हवी के बीच हो गया था । पहली नजर का पहला प्यार ,जिसकी शायद दोनो ने कल्पना भी न की होगी कि उनके साथ भी ऐसा कुछ होगा।
कितनी बाते हुई थी उस दिन वक्त ने भी कितना साथ दिया था फिर क्या था सिलसिले जो शुरू हुए बात बढती ही गई। रोज का मिलना मिलाना ,भविष्य के सपने देखने से लेकर और न जाने क्या क्या किसके किसके गीत गाये जा रहे थे । कभी कभी तो मेरा शहर में बहने वाली वह पवित्र नदी भी इनकी मोहब्बत की गवाह बन जाती जब उसके किनारो पे घंटों समय व्यतीत करते। साथ जीने मरने की कसमे खाते।
कितना अच्छा चल रहा था और अचानक न जाने किसकी नजर लग गई थी इनके साथ को,मोहब्बत को।
फाइनल की परीक्षा खत्म होते ही आकार को एक जाब मिल गई थी और मिलना कुछ कम हो गया था कालेज भी छूट गया था पर समय के साथ प्रेम बढता रहा फोन पर बातो का सिलसिला चलता रहा और कहते है न "सौ दिन का चोर एक दिन पकडा जाता है " वही आकार और जान्हवी के साथ भी हुआ ।दोनों के माता पिता को खबर हो गई थी इनके इस प्यारे से इश्क की।
फिर क्या वही हुआ जो सभी घर वाले अपनी झूठी शान और इज्जत के लिए करते हैं ।
दोनों घरो में शहनाईयां बजने की तैयारियां चलने लगी । और वो दोनों थे कि अपने घर वालो को मनाने की नाकाम कोशिशे कर रहे थे जबकि उनके भाग्य का फैसला पहले ही हो चुका था।
आकार और जान्हवी की कई महीनों से बात भी तो नहीं हो पाई थी मुलाकात तो दूर की बात रही। जान्हवी की सगाई हो गई थी शादी की डेट फिक्स हो गई थी कार्ड छपकर घर आ चुके थे ।जान्हवी को कुछ समझ ही नह आ रहा था कि इतनी जल्दी क्या हुआ जा रहा है?
और इन सभी खबरों से अंजान आकार अपने मा और पिता को मनाने में कामयाब हो गया था आकार के पिता इस रिश्ते के लिए तैयार हो गये थे पर एक शर्त भी तो रख दी थी कि लडकी के पिता आयेंगे रिश्ता लेकर तभी ये रिश्ता होगा । पर अब बहुत देर हो गई थी उधर शादी की तैयारियां जोर सोर से चल रही थी।
आकार की खुशी का ठिकाना न रहा और यही सोचकर सोया कि कल ही जान्हवी को मिलकर खुशखबरी देगा इस लिए फोन भी नहीं लगाया आकार ने।
और अगली सुबह जब आकार तैयार होकर जान्हवी के घर जा रहा था जो 'मेरा शहर' के दूसरी ओर लगभग पांच छ किलोमीटर दूर था ।
आकार निकला ही था कि वह ठीक दो महीने बाद मिलेगा और खुशखबरी देगा तभी डोरबेल बजी "डिंगडांग डिंगडांग" आकार ने जैसे ही दरवाजा खोला उसकी आंखे फटी की फटी रह गई जान्हवी को इस तरह आया देखकर।और ऐसा लग रहा था की मानो समय ठहर सा गया हो कुछ वक्त के लिए तभी मां ने पीछे आवाज दी बेटा कौन है ऐसा लगा जैसे नींद से जगा दिया हो किसी ने।
कैसी हो जान्हवी आकार ने पूछा ?जान्हवी की आंखे भर आई रुंधे गले से कहा अच्छी हूँ तुम बताओ पर आंखे तो कुछ और ही कह रही थी ।
अपनी शादी का निमंत्रण पत्र थमाते बोली बस आखिरी बार के लिए आइ हू तुमसे मिलने तुम्हें देखने आकार ।
"मतलब जान्हवी",आकार बोला। वह कुछ समझ नहीं पाया था अरे पगली मेरे मम्मी पापा मान गये हैं इस रिश्ते के लिए।
पर बहुत देर हो गई आकार जान्हवी बोली और रोते हुए दौड गई बिना और कुछ कहे फिर कभी न मिलने वापिस आने के लिए।
आकार ने जब कार्ड पर लिखे जान्हवी का नाम पढा तो उसके तो मानो जैसे प्राण ही सूख गये हो ।समझ नहीं आ रहा था कि वह खुश हो या दुखी ।
वह कार्ड देने आई थी या बताने कि मै अपनी जिंदगी में आगे बढ चुकी हूँ और अब तुम भी बढ जाओ।
इंविटेशन कार्ड हाथ में लिए आकार बुत बना खडा रहा समय ने फिर एक बार और एक मोहब्बत को छला था ।
फिर एक बार सच्ची मोहब्बत समय के हाथो हार गई थी फिर एक बार सच्ची मोहब्बत मुकम्मल होकर भी अधूरी रह गई ।...✍
फिर मिलूंगा एक और नई कहानी के साथ धन्यवाद
लेखक - अमित साहू

Very very nice
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