गवार ही सही
आज मेरी छुट्टी थी अर्थात अवकाश और ऐसे में मेरा सारा दिन घर पर ही बीतने वाला था सुबह का वक्त समाचार पत्र के पन्नों को अलटने पलटने के साथ और भौजाई के हाथों बनी गरमा गरम पकौडी और चाय के साथ बीता ।
पर इतने से सारा दिन कहां बीतने वाला था ।
बच्चों को खेलते हुए देखा तो मुझे भी अपना बचपन याद आ गया कि कैसे मै ,मेरी बडी बहन और छोटा भाई हम तीनो मिलकर धमाचौकडी मचाते थे , छुट्टी वाले दिन तो सारा घर ही सर पर उठा लेते थे और फिर मै भी थोडी देर बच्चा बनकर बच्चों के साथ खेलने लगा जब थक गया तो कमरे में आकर टीवी चैनल के चैनलों को बदलने में बीता ।और टाइम कैसे बीता पता ही नहीं चला कि शाम के पांच बज चुके थे । सारा दिन घर पर ही रहा तो थोडा ऊब सी लगने लगी तभी खयाल आया क्यो न आज मेरा शहर की गलियों मार्केट को घूम टहल लिया जाय । वैसे भी बहुत समय बीत गया था इन गलियों में घूमे ,जबसे काम करने लगा हूँ वक्त ही नहीं मिलता कहीं आने और जाने का। फिर चल पडा पैदल, मेरा शहर की गलियों में टहलने ।थोडे ही समय में कितना कुछ बदल चुका था सही कहते हैं लोग समय के साथ सबकुछ बदल जाता है जैसा कि आज मेरा शहर की गलियां और मार्केट।
अभी कुछ ही दूर चला था कि अगले ही नुक्कड़ पर मेरे दोस्त युग से मुलाकात हो गई चूंकि काफी दिनों बाद मिल रहे थे तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा इस भागा दौडी की जिंदगी में , कहाँ किसी के पास समय है किसी से मिलने का और ऐसे में कोई मिल जाए तो आप समझ सकते हैं कितनी खुशी होगी और यदि कोई आपका अजीज हो तब ऐसे में कहना क्या?
बाते करते हुए हम एक चाय की दुकान पर गये और फिर घंटों बाते हुई ।
वैसे मेरा जो दोस्त है युग अब पहले से स्मार्ट ,हैंडसम और इंटेलिजेंट हो गया था । पर पहले ऐसा नहीं था उसे कपडे पहनने ,बोलने बतियाने का कोई सलीका नहीं था ।पढने लिखने में भी ज्यादा रुची नहीं थी पर समय का चक्र ऐसा चला की सबकुछ बदल गया और मेरा दोस्त आज एक सफल बिजिनेस मैन बन गया था।
जब मैने उससे उसका हाल चाल पूछा तो बडा रूखा सा जवाब दिया ,' बस कट रही है यार।'
मैने कहा ,"क्या यार ,ये भी कोई जवाब है,बस कट रही है । अरे सबकुछ है तुम्हारे पास ऐसे में तुम्हें तो कहना चाहिए लाइफ इंज्वाय कर रहा हूँ और तुम हो की ।
क्या हुआ?कोई बात है क्या?
युग : अब क्या बताउ यार ।
मुझे न मैफिले अच्छी लगती हैं और न ही दुनिया की ये भीड।सच कहता है तू सबकुछ है मेरे पास फिर भी अकेला हूँ ,तन्हा हूँ मेरे दोस्त।
मुझे समझते देर न लगी की मामला लव सव का है फिर मैने कहा चल बता अच्छा कौन है वो?
उसने बताया की कैसे उसके जीवन में स्नेहा की इंट्री हुई और कैसे वो आम से खास बन गई उसके लिए। युग: अभी मेरा कालेज टाइम था अर्थात पढाई चल रही थी और यहीं तो कोचिंग में मिली थी वो 'स्नेहा'। कितनी सुंदर थी ,मासूम । और उसकी मासूमियत का ही तो मै कायल हो गया था और मेरी दोस्ती भी तो हो गई थी मेरी उससे अच्छी बनने लगी थी पर उसके दिल में मेरे लिए क्या था मैं बिल्कुल अनभिज्ञ था और न जाने फिर कब धीरे धीरे मेरे दिल में उसके के लिए चाहत के बीज अंकुरित होने लगे। मुझे खुद भी नहीं पता चला कि कब उसकी खूबसूरती मासूमियत का दिवाना बन बैठा ।
कब उसने मेरे दिल में अपना घर बना लिया? कैसे और कब मेरी नींदो सुकून को चुरा लिया ख्वाबो में अपना डेरा डाल लिया था मुझे पता ही नहीं चला।
उसके हावभाव से मुझे यही लगता रहा कि उसको भी मुझसे प्रेम है पर मै गलत था,अंजान था ।
जैसे ही उसे मेरे दिल की फीलिंग के बारे में पता चला । उसके हावभाव ही बदल गये सारे रिश्ते खत्म कर दिये और जिन रिश्तों का अभी जन्म भी नहीं हुआ था वो रिश्ते भी जन्म से पहले ही मर गये। चाय में गिरी मक्खी जैसे कोई अलग कर देता है कुछ इस तरह से उसने मुझे किया । क्या मेरी लाइफ बनाने के लिए या फिर किसी और कारण से ऐसा किया।
मैने कितने ख्वाब देख डाले थे और आज सारे ख्वाब बेमानी थे उसने तो यहां तक कह दिया था कि मुझ गवार को वह पसंद तो करती नहीं फिर प्रेम और लाइफ पार्टनर तो दूर की बात । दोस्ती तो टाइम पास के लिए की थी ।
उस दिन मैने ठान लिया कि मै खुद को बदल डालुंगा और आज देखो मेरे पास सबकुछ है करोडो का आदमी बन गया हूँ।
बस तकलीफ एक ही बात की है कि जिसकी बदौलत मै आज जिस शिखर पर पहुंच गया हूँ वही आज मेरे जीवन मे नहीं है । दोस्त ये उसी की देन है जो आज युग ,गवार युग नहीं ,बल्की युग एक ब्रांड बन गया है।और उसके इस कृत्य के लिए उसे धन्यवाद।शायद अगर वह ऐसा न करती तो आज भी मैं वही गवार युग ही रहता।अब सबकुछ है फिर भी कितना बदनसीब हूँ यार । उसका ही साथ नहीं ,सबकुछ है ,बस वही नहीं ।आज भी उसकी यादें मुझे मैफिल में अकेला कर जाती है भीड में तन्हा कर देती है और मै कुछ नहीं कर पाता । कितना बदकिस्मत हूँ मै।
युग एक बात कहूँ,
" ये तेरी बदनसीबी नहीं,
कि वह तेरी नहीं हुई।
ये उसकी बदनसीबी है ,
कि तुम्हे वह अपना न बना सकी।।"
अब आगे बढो मेरे यार तुमने तो बहुत कोशिश की न । पर वही नहीं समझ सकी तुम्हें। वह तुम्हें कोयला समझती रही गवार कहती रही और आज वही गवार कोयले मे छिपा हीरा निकला ।जो समय आने पर चमकने लगा है और देखना उसे पछतावा होगा एक दिन ।
युग: हमम होगा जरुर होगा पछतावा पर मै उसके लिए गवार था तो मै गवार ही सही।
लेखक -अमित साहू

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