टाइम पास
मेरा शहर का चौराहा कितना फेमस हो चला था दिन के समय जितना व्यस्त रहता चहलपहल रहती उतना ही रात के सन्नाटे मे खो जाने वाला चौराहा था और इसके इसी गुण के कारण मेरा शहर के बासिंदो ने इस चौराहे का नामकरण कर दिया," गुलजार सन्नाटा चौराहा।"
दिन के वक्त गुलजार और रात के समय सन्नाटा इसलिए गुलजार सन्नाटा चौराहा।
आज इसी गुलजार सन्नाटा चौराहे पर कुछ दिन की छुट्टीयो पर आया अनिकेत एक चाय की दुकान पर बैठा किसी पुरानी फिल्म के गाने के बीच चाय की चुसकियो का आनन्द ले रहा था,
" चांदी की दीवार न टूटी प्यार भरा दिल तोड दिया इक धनवान कि बेटी ने निर्धन का दामन छोड़ दिया ,चांदी की दीवार न टूटी...."
तभी उसकी नजर इंजीनियरिंग कालेज की आकर रुकी बस से उतरते कुछ स्टूडेंट्स पर पडी जिसमें एक जोडा उतरकर सीधे चाट बताशे की लगी ठेलिया की ओर बढ आया।
अनिकेत का पूरा ध्यान उन्हीं खूबसूरत जोडे पर जाकर केंद्रित हो गया । पूरा दृश्य अपनी नजरों में कैद करने लगा जैसे कोई मूवी कि शूटिंग चल रही हो जो हर ऐंगल से देखे जा रहा था कभी इधर से तो कभी उधर से।
वो स्टूडेंट सीधे ठेलिया के पास जाते ही बोल पडी ,"भैया बतासे खिलाइए ,जलजीरा बढिया चटपटा तीखा बनाया है न।
ठेलिया वाला : हाँ बेबी जी,हमें पता है आपको जलजीरा तीखा चटपटा पसंद है और आप तो हमारी पर्मानेन्ट ग्राहक हैं , क्यों नमन बाबू सही कहा न और यह कहते हुए ठेलिया वाले ने स्टील की कटोरियां पकडा दी।
अनिकेत को हैरानी तब हुई जब पहले आप पहले आप के चक्कर में बेचारे एक बताशे को बेवजह मुंह में जाने से पहले ही शहीद हो जाना पडा।
लडकी तुनकते हुए बोली, क्या नमन इतना स्वादिष्ट बताशा खराब कर दिया।
नमन ( तोतली भाषा में ): अले अले मेला बाबू गुच्छा हो दया त्या। तोइ तात नहीं तूम औल था लेना तस पंद्रला लुपये ता।
लडकी: चलो अच्छा नौटंकी न करो खाओ नहीं ये भी खराब हो जायेंगे।
दुकानदार भी दोनो को देखकर मुस्कराते हुए बोला कोई बात नहीं बेबी जी और खा लीजिए पैसे न दीजिएगा।
लडकी : अरे अरे ठीक है भैया हम तो बस ऐसे ही..,
वैसे जलजीरा लाजवाब बनाते हैं आप।
दोनों ने खूब छककर बताशे खाये और नमन ने जैसे ही पर्स निकाला रूपए देने के लिए लडकी ने मना कर दिया । बोली नमन तुम रहने दो मै देती हूँ।
नमन क्या बात है प्रतिभा आज तुम?
प्रतिभा:तो इसमे आश्चर्य की क्या बात?
नमन: हमम कुछ नहीं।
पैसे देकर एक टैक्सी में बैठे और चले गये ।
अनिकेत बस मुस्कराता रहा और सोचने लगा कि उसका और भावना का भी तो कुछ ऐसा ही रिश्ता था मै और भावना भी तो अक्सर साथ में ऐसे ही तो हाथ में हाथ डालकर घूमने जाते थे इंडिया गेट और वहीं बताशे भी तो खाते थे ।
अनिकेत की आंखें भर आई थी थोड़ा सा उदास हो गया था वह उठा और अपनी बाइक स्टार्ट की और फिर घर चला आया था।
अभी घंटे भर भी न बीता होगा कि उसका फोन बज उठा
," भुला देंगे तुमको सनम ,धीरे धीरे । मुहब्बत के सारे भरम धीरे धीरे , भुला देंगे तुमको सनम धीरे धीरे.......।।"
गाने के बोल सुनकर धडकने थोड़ी बढ सी गई थी अनिकेत की।
अनिकेत ने फोन रिशीव करने के लिए जैसा ही उठाया देखा तो पिता जी का फोन,
अनिकेत कुछ रुंधी आवाज में बोला ,हाँ पापा।
अनिकेत के पिता: अनिकेत , बेटा सुनो , आज तुम्हारी बुआ जी आ रही हैं उन्हें गुलजार चौराहे से पिक अप कर लेना ।
यही कोई पांच बजे तक आ जायेंगी।
ठीक है पापा कहते हुए अनिकेत ने फोन काट दिया।
अब अनिकेत की आंखें कुछ नम थी अपने आंसुओं को छुपाते हुए बेशिन में चहरा धुला और मा से बुआ को लेने जाने की बात कहकर निकल पडा गुलजार सन्नाटा चौराहा..... बस स्टाप के लिए।
अनिकेत दोपहर को जिस दुकान पर बैठा था वही जाकर फिर बैठ गया और बुआ के आने का इंतज़ार करने लगा।। और न चाहते हुए भी अनिकेत की नजर उसी बताशे वाले की ठेलिया पर थी। जहाँ बताशे खाने वालों की काफी भीड़ थी हाथ में कटोरिया लिए खडे थे और भीड़ हो क्यों न इतने अच्छे बताशे और जलजीरा जो बनाता था छग्गू चाचा।
अभी दस से पंद्रह मिनट बीता होगा कि नमन एक दूसरी लडकी के साथ वहीं फिर दिखा, शायद ये भी उसकी गर्लफ्रेंड थी तभी नमन उससे कुछ ज्यादा ही चिपक रहा था।
दोनो ने करीब दस दस रुपए के बताशे खाये और चल दिये ।
बाइक में बैठते हुए नमन बोला अंशु कुछ और खाना है , दही बडा वडा खा लो।
अंशु: नहीं नहीं,अब घर चलना है
देर हो गई तो डाट पडेगी और सुनो तुम मुझे रास्ते में ही छोड़ देना ।
अंशु ने मुह में कपडा बांधा और बाइक पर बैठकर चल दिए।
अनिकेत उन दोनों को देखता चाय की चुसकियां ले रहा था और सोच रहा था कि कितना आसान होता है न किसी के साथ टाइम पास करना।कभी ये कभी वो फिर कभी कोई और,
पर मुझसे क्यो नही हो पाता ? भावना भी तो ऐसे ही थी वह भी तो मेरे साथ यही कर रही थी सिर्फ टाइम पास।सोचते सोचते अनिकेत यादो के समुद्र में कूद सा गया था हर तरफ उसे अंधेरा दिखाई देने लगा और उस अंधेरे के बीच यादों की तस्वीरें दिखाई देने लगी।
दिल्ली की वह सुहावनी सुबह अनिकेत कैसे भूल सकता है उसी दिन तो भावना से मुलाकात हुई थी जब अनिकेत आफिस पहुँचा था ।
आफिस पहुंच कर उसने देखा था उसके अपने केबिन में एक लडकी कर्मचारी को काम करते जो अब उसका केबिन न रह गया था।
अनिकेत कुछ बोलता कि इसके पहले ही वह लडकी जिसकी उम्र अभी यही कोई बाइस तेइस रही होगी मुडी।
कजरारी आंखें,गोल चहरा रंग गोरा,काले लंबे बाल होटो पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक गहरी स्काईब्लू और थोडी थोडी क्रीमी रंग की उसकी ड्रेस चहरे पर एक मुस्कुराहट जो उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे।
मानो स्वर्ग से जैसे जमीन पर कोई परी उतर आई हो।
एक पल तो अनिकेत को लगा क्या बला है यार ।उसकी खूबसूरती और एक अंजाने चहरे के आगे थोडा सा हकलाते हुए आ ..आप कौन आ...और मेरे केबिन में क्या कर रही हैं।
सर मैं भावना ,इस कम्पनी में न्यू इम्पलाइ हूँ । मैनेजर सर ने मुझे आपके केबिन में काम करने को कहा है ।
ये बाते हो ही रही थी कि मैनेजर सर भी गये ओर बोले अनिकेत इनसे मिलो ये हैं मिस भावना आहुजा जो अब तुम्हारी जगह काम करेंगी और तुम मेरे साथ आओ मै तुम्हें तुम्हारा काम बताता हूँ।
अनिकेत मैनेजर के पीछे पीछे जाता है
मैनेजर: अनिकेत आज से तुम्हारा केबिन ये रहा मेरे केबिन के बगल में ।
तुमने इतने कम समय में सब कुछ इतना अच्छा समझ लिया है इसीलिए अब से तुम इन सारे कर्मचारियों का काम देखोगे उनके काम में उन्हे मदद करोगे और बाहर से आने वाले आर्डर को देखोगे यही तुम्हारा काम होगा।
अनिकेत अपने न्यू केबिन में जाकर बैठा और एक गहरी सांस ली ।
बडा अजीब लग रहा था कि उसे भावना की वजह से अपना केबिन छोडना पडा। इन खयालो के बीच लंच का वक्त हो गया पता भी नहीं चला स्टाफ के सारे लोग इकट्ठा होने लगे अनिकेत महोदय भी अपना नया केबिन छोडकर बाहर निकले और अपने कलीग्स के साथ जा बैठे और लेडीज डिपार्टमेंट लेडीज के साथ बैठा पर आज एक अलग ही रौनक थी आफिस में ।
चर्चा का विषय भावना । उसकी खूबसूरती,उसकी सादगी बस यही चर्चाए होती रही और अनिकेत अपने में ही मस्त रहा सभी की बाते बडे ध्यान से सुने जा रहा था बिना कुछ बोले और इतनी तारीफे हुई भावना की पहले ही दिन की अनिकेत के हृदय में गुदगुदी सी होने लगी । पर मुख से एक भी शब्द न निकल रहा था अपने नीरस रवैया के चलते ।
उससे जब शशिकांत ने कहा अरे यार अनिकेत तुम भी कुछ कहो बोलो कैसी लगी अपने आफिस की नई हेरोइन ।
अनिकेत स्वभाव के अनुसार ही अच्छी है ज्यादा कुछ खास तो नहीं है हाँ पर ठीक ठाक है ।
जबकि हृदय में ज्वार भाटा सा उठ रहा था।
दस पंद्रह दिन बीते की पूरा स्टाफ भावना से और भावना भी पूरे स्टाफ आफिस के नये वातावरण में में घुल मिल गई हाय हैलो गुडमार्निंग आदि सब मिस होने लगा।
एक दिन पूरा स्टाफ घूमने निकला तो रास्ते में न जाने क्या सोचकर भावना ने अपना टिफिन अनिकेत के साथ शेयर किया सिर्फ अनिकेत के साथ। अनिकेत ने जब मना किया तो फोर्स करने लगी ।
अनिकेत के मित्रों ने उस बेचारे की खिचाई भी खूब किए,क्या बे अनिकेत सिर्फ तुम , हाँ भाई एक तुम ही तो हो हम सब में हैंडसम हो कुवारे हो कृष्ण कन्हैया हम तो शादी सुदा भी हैं और हैंडसम दूर दूर तक नहीं।
पर अभी भी ये सब नार्मल बाते थी अनिकेत के लिए।,पर अचानक समय के बीतने के साथ साथ दोनो में नजदीकियां बढने लगी थी एक दूसरे को पसंद करने लगे थे अब उसकी हर अदा अनिकेत के दिल पर वार करती थी । उसकी बाते अगर होती तो अनिकेत कुछ देर ठहर कर उसकी बात को सुनने लगता।
वाकइ जैसे कोई जादू की छडी लेकर आई थी पूरे आफिस का माहौल ही बदल गया था ।
अक्सर फोन पर बाते होने लगी चैट होने लगी यहाँ तक की एक दूसरे की परवाह होने लगी थी खयाल रखने लगे थे।
और अनिकेत ने तो न जाने क्या क्या सपने देख डाले थे साथ में घूमना फिरना सिनेमा जाना , उसकी गोद में सर रखकर लेटना , भविष्य के कुछ गीत गुनगुनाना...।
पर ये सारे के सारे ख्वाब धरे के धरे रह गए जब अचानक बिना कुछ बताए भावना ने आफिस आना बंद कर दिया था यहाँ तक की अनिकेत से भी बातचीत बंद सी हो गई थी।
शाॉक तो तब लगा अनिकेत को जब पता चला कि वह तो अनिकेत के साथ सिर्फ टाइम पास कर रही थी अनिकेत को यकीन करना मुश्किल हो रहा था की इस दुनियां में ऐसे भी लोग हैं ।
और अगर वह टाइम पास कर रही थी तो फिर उसका मेरी परवाह करना ,मेरे बारे सोचना,सही सलाह देना उसकी मीठी मीठी प्यारी बाते फरेब थी क्या सब झूठ था?
कैसे कोई केवल टाइम पास करने के लिए किसी के दिल ,जज्बात , भावनाओं से खेल सकता है ।
कैसे कोई किसी का दिल यूं एक ही पल में तोड सकता है?
अनीकेत इन अनसुलझे खयालो में डूबा ही था कि किसी ने आवाज दी अनिकेत ..अनिकेत...अनिकेत
अनिकेत का ध्यान भंग होते ही उसने देखा तो बुआ खडी आवाज दे रही थी अनिकेत अपनी गीली हो चुकी आंखो को पोछता हुआ बाहर आया और बुआ के पैरो को स्पर्श किया । बुआ: कहाँ खोया था और ये क्या तेरी आंख में आंसू। क्या बात है बेटा ?
कुछ नहीं बुआ वो आंख में कुछ पड गया था।अब
अनिकेत की नजर उसी चाट फुलकी वाले की ठेलिया पर पडी जहाँ अब भी कुछ जोडे और कुछ लोग हांथो में कटोरियां लेकर खडे बाते कर रहे थे।
अनिकेत ने गाडी स्टार्ट की और बुआ को बठाकर चल दिया ये कहते हुए कि बुआ दुनिया कितनी बदल गई है न । लोग कितने मतलबी हो गए है न । बस अपना किसी तरह टाइम पास करना चाहते हैं न सिर्फ।
बुआ: हममम..
और बुआ समझ रही थी की कुछ बात तो है जो अनिकेत छुपा रहा था।
लेखक - अमित साहू....✏

Kya baat hai....
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