सूटकेस वाली

पूरा स्टेशन लोगों से खचाखच भरा हुआ था हर तरफ भारी भीड़  और धक्का-मुक्की का आलम था ।सभी को अपने अपने गंतव्य तक जाने की जल्दी थी तो इसलिए सभी बड़ी बेसब्री से अपनी अपनी ट्रेनों के आने का इंतजार कर रहे थे राहुल भी किसी तरह धक्के मुक्के  खाते प्लेटफॉर्म पर जा पहुंचा पहले तो भीड़ को देख कर मन किया कि वापस हो  जाए पर देर हो चुकी थी वापस जाने का कोई साधन नहीं और साथ में इतना सामान बड़ी आफत थी । अभी किसी तरह उसने खुद को अडजस्ट ही किया था कि अचानक उसकी नजर एक गोरी चिट्टी सुंदर सी युवती पर पड़ी जो एक नीले रंग का सूट सलवार पहने हुए खड़ी थी और बड़ी ही व्याकुलता से ट्रेन के आने का इंतजार कर रही थी ऐसा लग रहा था कि जैसे वह घर छोड़ कर आई थी या उसका कोई पीछा कर रहा था क्योंकि रह-रहकर बार-बार, वो लिए हुए अपने सूटकेस को देखती और तो कभी डरी डरी इधर उधर देखती तो कभी कभी बाहर गेट की ओर देखती ।
कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा है जो उसे पकड़ ले जैसे कोई चोर हो या चोरी करके आई हो इस तरह से सहमी सहमी सी थी और प्लेटफार्म की ओर देखती ,पता नहीं कहाँ जाना था उसे।
काफी ठंड भी पड रही थी फिर भी उसे पसीना आ रहा था बहुत घबराई हुई प्रतीत हो रही थी।
राहुल तो सबकुछ भूलकर बस उसे ही देखे जा रहा था।
बीच बीच मे तो ऐसा लगता कि जैसे राहुल से कुछ कहना चाहती हो और उसे भी लगता कि मैं ही पूछ लूं क्या? पर हिम्मत नहीं हो पा रही थी कि लाओ पूछ लूं कहाँ जाना है?
इतनी परेशान क्यों है नाम क्या है पर हिम्मत नहीं हुई राहुल की कि उससे पूछ ले और फिर इतने में ही अनाउंस हुआ कोलकाता से चलकर आनंद बिहार दिल्ली तक जाने वाली आनंद बिहार एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर एक पर आ रही है । ट्रेन आकर रुकी ही थी कि इतनी भीड हो गई थी कि जब
वह ट्रेन में चढी तो इतना धक्का मुक्की अफरा तफरी मे उसका सूटकेस वहीं प्लेटफार्म पर ही गिर गया और इतनी भीड़ कि उठा भी नहीं सकती थी राहुल बढा ही था उसकी मदद के लिये पर इतनी भीड़ से होकर वहाँ तक पहुंचने से पहले ही ट्रेन चल पडी । ट्रेन के जाने के बाद राहुल उसका सूटकेस देख रहा था पर कहीं दिखा नहीं। उसने भी खैर छोडो कर अपनी जगह आकर बैठ गया।पहले की अपेक्षा 
भीड़ कम ही हुई थी कि इतने में कहीं से बम ,बम, प्लेट फार्म पर बम का शोर सुनाई दिया
अभी अभी जो माहौल शांत ही हुआ था कि फिर से कुरुक्षेत्र का मैदान सा बन गया।हर तरफ अफरातफरी, सभी अंधे से होकर भागने लगे थे जो गिरा फिर उठा नहीं।
राहुल किनारे बैठा सब देख रहा था ऐसा लग रहा था उसे अपने जीवन की कोई परवाह ही नहीं जहाँ सभी अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे तो वह वहीं बैठा रहा चुपचाप।
हां शायद सोच रहा था कि ये कैसा हमारा शिक्षित समाज है जहाँ कोई बुध्दि , दिमाग से काम ही नहीं ले रहा है।जो स्टेशन दस से बारह मिनट में खाली हो सकता था वहाँ घंटों लग रहे हैं ।
राहुल को बडी हैरानी हो रही थी ऐसे मंद बुद्धि समाज को देखकर।
और इसी बीच बम निरोधी दस्ता भी आ चुका था स्टेशन भी लगभग खाली हो चुका था पर अब भी बहुत से घायल हुए पडे थे जिन्हें अस्पताल ले जाने की व्यवस्था की जा रही थी और जो थोड़े उत्साही यात्री थे उन्हें भी स्टेशन से बाहर किया गया और कम्प्यूटर वाली देवी भी कमाल की थी लावारिस वस्तु को न छुए बम हो सकता है ऐसी कोई वस्तु दिखे तो तुरंत सुचित करें। बोले जा रही थीं , भला हो कम्प्यूटर वाली देवी का जिन्हें लोगों की फिक्र थी।
बम की तलाश शुरू हो चुकी थी सारा स्टेशन छान मारा गया पर बम कहीं न मिला।
फिर न जाने अचानक कहीं से एक आवाज आई उस लावारिस सूटकेस मे बम है।
राहुल जो किसी तरह स्टेशन के अंदर फिर पहुंच गया था यह सुनकर हैरान रह गया उसके तो मानो जैसे होश ही उड गए थे तो क्या इसलिए परेशान थी।
इतनी खूबसूरत लडकी एक आतंकवादी , राहुल का तो दिल बैठा जा रहा था सोच सोचकर।
पर जब पुलिस ने उस सूटकेस को खोला तो पाया लहंगा चुन्नी मेकअप का सामान और दुल्हन को सजाने वाली आर्टिफिशियल ज्वैलरी जिसे देखकर समझ आ रहा था कि वह कोई ब्युटिपार्लर वाली थी।
वैसे किसी के चहरे पर तो नहीं लिखा होता कि कौन क्या है पर अब राहुल ने राहत की सांस ली मानो उसकी जान मे जान आ गई हो।
कि चलो वह कोई आतंकवादी नहीं थी पर किसी आतंकवादी से कम भी नहीं थी।
क्योंकि राहुल तो उस सूटकेस वाली लडकी के मासूम से चहरे और उसकी  काली आंखों से घायल हो चुका था।

लेखक -अमित साहू

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